माँ अंगारमोती मंदिर, धमतरी

Maa AngaarMoti

Maa AngaarMoti वनदेवी माँ अंगारमोती परम तेजस्वी ऋषि अंगीरा कि पुत्री थी जिसका आश्रम सिहावा के पास घठुला में है| देवी माता का मंदिर वर्तमान में गंगरेल बाध के तट पर स्थित है| माता खुले आसमान के नीचे अपना आसन स्थापित किया है|जिले में दो जगह विराजित है

माता अंगारमोती का जिले में दो स्थानों पर प्रतिमा स्थापित है। गंगरेल में माता का पैर स्थापित है, वहीं रुद्रीरोड सीताकुंड में माता का धड़ विराजमान है। सीताकुंड स्थित अंगारमोती मंदिर के पुजारी जगदीश राम नेताम, वार्डवासी खूबचंद गुप्ता, राजाराम साहू ने बताया कि यह धड़ पास के तालाब में मछुआरों के जाल में फंसा मिला, मछुआरों ने इसे मामूली पत्थर समझकर वापस तालाब में ही डाल दिया। फिर गांव के ही एक व्यक्ति को माता का स्वप्र आया कि उसे तालाब से निकालकर पास के ही झाड़ के नीचे स्थापित किया जाए। गांव वालों के सहयोग से फिर यही माता की स्थापना हुई। माता का मूल मंदिर वनग्राम  चंवर ,बटरेल ,कोरमा और कोकड़ी कि सीमा पर सुखा नदी के पवित्र संगम पर स्थित है| माता को ५२ ग्रामों कि अधिष्ठात्री देवी है|

पुजारी के अनुसार उसके पूर्वजों ने उन्हें बताया था कि बस्तर के धापचावर गांव में माता विराजित थी, जिसे किसी चोर ने चुरा लिया था। पैर गंगरेल में था तो धड़ सीताकुंड में आ गया। मूर्ति को चुराने वाला चोर भी मारा गया। जगदीश ने बताया कि 20 साल पूर्व अंगारमोती माता की प्रतिमा बनवाकर यहां स्थापित किया गया है। माता के साथ शेर भी है, जिसे कुछ लोगों ने देखा है। माता के आसपास एक सर्प भी है, जिसे सीताकुंड के कई लोगों ने देखा है। मंदिर में अंगारमोती माता के अलावा, शीतला माता, दंतेश्वरी माता, भैरव बाबा स्थापित है। गंगरेल में जिस दिन मड़ई का आयोजन होता है, उस दिन यहां भी मड़ई भरता है। 

माता अंगारमोती दुखियों की मनोकामना भी पूरी करती है। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ जो भक्त यहां नारियल बांधता है उसकी मुराद माता पूरी करती है। इतना ही नहीं कई भक्तों की शारीरिक तकलीफ भी दूर हुई है। दोनों नवरात्र में यहां भक्त मनोकामना ज्योत जलवाते हैं। शहर के अलावा दुर्ग, रायपुर, कांकेर सहित अन्य जिलों के भक्त यहां ज्योत जलवाते हैं। इस साल चैत्र नवरात्र में यहां 36 भक्तों का ज्योत जगमग हो रहा है।