मां महिषासुर मर्दिनी, चैतुरगढ़

Maa Mahisasurardini

Maa Mahisasurardini Korba जिले के प्रमुख देवी मंदिरों में पाली चैतुरगढ़ के पहाड़ ऊपर स्थित मंदिर में विराजमान मां अष्टभुजी के दरबार में ज्योति जवारा प्रज्ज्वलित कराने को लेकर भक्तों में उल्लास देखा जा रहा है। हरियाली से आच्छादित पर्यटन व आस्था स्थल छग के कश्मीर चैतुरगढ़ में स्थित ऐतिहासिक महिषासुर मर्दिनी के दरबार में नवरात्र पर्व भर भक्तों की कतार लगी रहेगी।
प्राचीन शक्ति स्थलों में पाली विकासखंड के चैतुरगढ़ स्थित मां महिषासुर मर्दिनी मंदिर जिले को एतिहासिक व सामरिक दृष्टि से समृद्ध करने वाला स्थल है। जिला मुख्यालय से 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चैतुरगढ़ किले का निर्माण कल्चुरी संवत 821 अर्थात 1069 ईस्वी में हुआ। इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि पाली कभी राजा जाजल्व देव और विक्रमादित्य की नगरी थी। गजेटियर में उत्तर पाली प्रदेश के नाम से इसका उल्लेख मिलता है। यहां मुख्य मार्ग पर 9वीं शताब्दी का राजा विक्रमादित्य द्वितीय द्वारा निर्मित शिव मंदिर विख्यात है। यहां से 10 किलोमीटर दूरी पर छत्तीसगढ़ की प्रमुख जमींदारी ग्राम लाफा है। यहां से 16 किलोमीटर पर दुर्गम घाटियों में ग्राम बगदरा स्थित है और बगदरा से 4 किलोमीटर की दूरी पर खतरनाक संरचना के बीच चैतुरगढ़ का किला स्थित है। चैतुरगढ़ किला 5 वर्ग किलोमीटर तक फैला हुआ। किले में चार द्वार हैं जिनमें मुख्यद्वार को सिंह द्वार कहा जाता है। इसके अलावा हुंकरा द्वार, मेनका द्वार व गुप्त द्वार शामिल हैं जिससे किले में प्रवेश किया जा सकता है। पर्वतीय किले के शिखर पर मां महिषासुर मर्दिनी की मंदिर स्थापित है। नागर शैली में निर्मित मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर है। मंदिर के गर्भगृह में बारहभुजी मां महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है। प्राचीन काल से यह मंदिर साधना व शक्ति आराधना का केंद्र रहा है। मंदिर में पूजा पहले राजा फिर जमींदार द्वारा किये जाने की परंपरा रही है।

वर्तमान में यह जिला पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्थल की श्रेणी में आता है। यहां प्रतिवर्ष वासंती व शारदीय नवरात्र में ज्योति कलश प्रज्ज्वलित होता। ज्योति कलश व देवी मां के दर्शन के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन यहां पहुंचते हैं। इस ऐतिहासिक धरोहर को संवारने और सहेजने का काम पूजा एवं विकास समिति द्वारा सक्रिय रूप से किया जा रहा है। एसईसीएल गेवरा क्षेत्र ने किले पर श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण कार्य कराए हैं। पर्यटकों के रुकने हेतु तीन कमरों की मातृछाया का निर्माण कराया गया है। वन विभाग द्वारा वन संपदा और हरियाली की रक्षा करने के साथ ही वन क्षेत्र व प्राणियों की सुरक्षा के उद्देश्य से चैतुरगढ़ मृगवन का प्रस्ताव शासन को पूर्व के वर्षों में भेजा है। चैतुरगढ़ की वादियों में वनोषधियों का भी विपुल भंडार है। जिले के प्रसिद्ध देवी स्थलों में चैतुरगढ़ ही एक मात्र ऐसा स्थल है जहां पर्वत के ऊपर सरोवर का होना भक्तों व सैलानियों के लिए आश्चर्य है। कहा जाता है कि मंदिर निर्माण के समय ही इस सरोवर को निर्धारित आकार दिया गया है। पवित्र सरोवर में स्नान कर भक्त माता का दर्शन करते हैं। पर्वत के इस सरोवर में बारहों महीने पानी रहता है। चैतुरगढ़ किला से सूर्योदय व सूर्यास्त दोनों का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है। किले के चारों ओर वाचिंग टावर बनाए गए हैं जिससे छत्तीसगढ़ की इस कश्मीर की वादियों को दूर-दूर तक देखकर कैमरे में कैद भी किया जा सकता है।

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