भोरमदेव मंदिर, कवर्धा

Bhoramdev Mandir kavardha

Bhoramdev Mandir kavardha-kabirdham छत्तीसगढ़ ने अपने अंचल में कई विरासत को संजोकर रखा है, भोरमदेव उनमें सबसे खास है, वह इसलिए क्योंकि यहां का शिल्प खजुराहो के जैसा है, लेकिन रोचक बात यह है कि यह मंदिर खजुराहो से भी पुराना है। जी हां, खजुराहो का मंदिर जहां दसवीं शताब्दी का बताया जाता है वहीं यह मंदिर सातवीं शताब्दी में ही बन गया था। यहां की इरोटिक मूर्तियों पर विवाद भी हो चुका है, इस मंदिर की मूर्तियों पर एक महिला ने हाईकोर्ट में पीआईएल भी लगा चुकी है, हालांकि उसे कोर्ट नामंजूर कर चुका है। 

आज भी जीवंत हैं प्रतिमा

प्राचीन स्थापत्य कला के कई उत्कृष्ट उदाहरण सदियों से छत्तीसगढ़ अंचल की शोभा बढ़ा रहे हैं, इन्ही में से एक है ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ कहा जाने वाला भोरमदेव का मंदिर। राज्य के कबीरधाम जिले में प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसा यह मंदिर अपने भीतर इतिहास की कई कहानियां समेटे हुए है। इसका सौंदर्य खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों से कम नहीं, इसकी दीवारों पर उकेरी गई प्रतिमाएं आज भी जीवंत जान पड़ती हैं। यह मंदिर छत्तीसगढ़ अंचल के समृद्ध इतिहास का साक्षी है, मंदिर के किनारे का विशाल सरोवर और उसके चारों तरफ फैली मैकाल पर्वत श्रृंखलाएं और हरी-भरी घाटियां यहां आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों का मन मोह लेती हैं। भोरमदेव राजधानी रायपुर से 134 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, रायपुर, बिलासपुर और कवर्धा जैसे प्रमुख शहरों से यह पर्यटन स्थल सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। 

मंदिर ग्याहरवीं सदी में नागर शैली में बनाया गया था | इस मंदिर में 16 स्तम्भ हैं और हर एक स्तम्भ पे कलाकृतियां उकेरी गयी हैं |

और अब बात करते हैं मंदिर के बाहरी हिस्से की | नाच – गाना – सम्भोग – भक्ति, सब मुद्राएं एक साथ दिख जाती हैं | और सम्भोग की ऐसी ऐसी मुद्राएं की सोचने में ही शर्म आ जाए  | ‘आदिवासी’ नाच गा कर प्रेम का उत्सव मानते दीखते हैं | वीणा सितार, और ‘लोकल’ वाद्य यन्त्र दीवारों पर उकेरे गए हैं, और सब लोग प्रेम क्रीड़ा में मग्न हैं |

ओशो कहता है की ‘सेक्स’ आपके दिमाग से ‘कण्ट्रोल – मैनिपुलेट’ करने की क्षमता को हटा देता है, न पुरुष बचता है, न स्त्री, सिर्फ प्रेम ही बचता है | वैसा ही कुछ इन चित्रों को देखकर आभास होता है | की ये लोग बस मस्त हो चुके हैं, एक के साथ एक, एक के साथ तीन, एक के ऊपर दो, दो के ऊपर एक, कुछ लोग काम-क्रीड़ा में लिप्त हैं, तो बाकी उनको देख कर ढोल नगाड़े पीट रहे हैं | लगता है की इन लोगों ने वक़्त से ही ओशो धारा में डुबकी लगा रखी थी | मंदिर की दीवार, मंदिर के अंदर – बाहर, सब ओर बस ऐसे ही चित्र बने दीखते हैं |

भोरमदेव में वैसे तो फोटो खींचने की मनाही है, जिसका मुझे कोई लॉजिकल कारण नहीं समझ आता , लेकिन फिर भी मैंने पूछ पाछ के, जोर जबरदस्ती से फोटो खींच ही लिए | कहते हैं की यहाँ कभी, जब पर्यटन इतना विकसित नहीं था, फिरंगी लोग बहुत आते थे| और वैसे भी जहाँ गरीब हो, वहाँ फिरंगी ज्यादा ही आता है, आप शायद मेरी बात न भी मानें, लेकिन मेरा मानना है की हिंदुस्तान में घूमने वाले आधे से ज्यादा फिरंगी या तो सस्ती भांग पीने आते हैं, या फिर गरीबों को ‘जीसस’ की शरण में ले जाने के लिए | और यहाँ छत्तीसगढ़ में कुछ फिरंगी तीसरी टाइप के भी थे, जिन्होंने लोकल लोगों के साथ मिलकर इन मंदिरों से मूर्तियां चुराने का धंधा शुरू कर दिया | मंदिर से कई पुरानी मूर्तियां उठाने का और उन्हें अंतराष्ट्रीय बाजारों में बेचने के किस्से आज भी छत्त्तीसगढ़ में सुने-सुनाये जाते हैं |

वहीँ भोरमदेव मंदिर के पास में एक और महल है जिसे मांडवा महल कहा जाता है, जो की वास्तव में एक शिव मंदिर है | इस मंदिर का निर्माण 1349 में हुआ था, और यह मंदिर तब बनाया गया था जब राजा रामचंद्र (अयोधया वाले राम नहीं) का विवाह अम्बिका से हुआ था | अब आप सोचिये की किसी के विवाह में एक ऐसा मंदिर बनाया गया जिसके अंदर बाहर सिर्फ काम – क्रीड़ा ही हो रही है | सोचिये आप की खुद की शादी में ऐसा कोई गिफ्ट दे दिया जाए, सबके सामने , सरेआम – सरेबाजार | क्या होगा?

तो मेरा ये मानना है की कहने को तो ये लोग आदिवासी हैं/थे, लेकिन इनका रहन सहन आज के सभ्य समाज से कहीं ज्यादा खुला, और सभ्य था | और अब जबरदस्ती इन लोगों को हम इनकी सभयता से अपनी सभ्यता में घुसा रहे हैं |

क्या है इस मंदिर की खासियत
मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीन स्तरों में विभिन्न प्रकार की मूर्तियों को उकेरा गया है जिनमें शिव की लीलाओं, विष्णु के विभिन्न अवतारों और अन्य देवी देवताओं की कई मूर्तियां शामिल हैं। दीवारों पर नृत्य करते नायक, नायिकाओं, योद्धाओं, काम-कलाओं को प्रदर्शित करते युगलों का बेहद कलात्मक ढंग से अंकन किया गया है। दीवारों की काम-कला की मूर्तियों की तुलना खजुराहो की मूर्तियों से की जाती है जिस कारण इस मंदिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है।

कौन हैं भोरम देव ?
यह मंदिर एक शिव मंदिर है, स्थानीय गोंड समाज में कुल देवता को बूढ़ादेव, बड़ादेव या भोरमदेव कहा जाता है, इसीलिए इस मंदिर का नाम भोरमदेव पड़ा। 

भोरमदेव महोत्सव में छत्तीसगढ़ी संस्कृति की झलक
भोरमदेव से जुड़े स्वर्णिम इतिहास,स्थापत्य कला, जनजातीय संस्‍कृति और प्राकृतिक सुंदरता को एक नयी पहचान देने के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा हर साल मार्च में तीन दिवसीय भोरमदेव महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस महोत्सव में छत्तीसगढ़ के ख्याति प्राप्त कलाकार गीत, संगीत और विविध लोक कलाओं की प्रस्तुति देते हैं, जिससे छत्तीसगढ़ी लोककला की समृद्ध संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। 

एक महिला ने कोर्ट में ले गई मंदिर को दुनिया भर में विख्‍यात खजुराहो और छत्तीसगढ़ के भोरमदेव मंदिर की प्रतिमाओं से महिलाओं का अपमान हो रहा है। छत्तीसगढ़ के कांसाबेल की रहने वाली सौम्या गर्ग ने बिलासपुर हाईकोर्ट में इस संबंध में एक याचिका दाखिल की। हालांकि, कोर्ट ने सौम्‍या गर्ग की याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन उनकी याचिका से नया विवाद खड़ा हो गया है। दूसरी ओर सौम्‍या का कहना है कि हाई कोर्ट ने भले ही उनकी याचिका कर दी है, लेकिन वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाने की तैयारी कर रही हैं। सौम्‍या का कहना है कि इससे पूरी नारी जाति का अपमान हो रहा है और इस बारे में सोचा जाना चाहिए। 

क्या है वर्तमान स्थिति यूं तो मंदिर को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित कर रखा है, लेकिन इसके बावजूद यहां कई गड़बड़ियां हैं। मंदिर प्रबंधन ने मंदिर के गर्भगृह में एसी लगा दिए हैं। इससे मंदिर को क्षति पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। वहीं इतना पुराना मंदिर होने के बावजूद यहां पर देसी-विदेशी पर्यटकों की संख्या बहुत कम है। बताया जा रहा है कि नक्सल प्रभावित राज्य होने के चलते यहां पर विदेशी पर्यटक नहीं आ पाते हैं।